नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम विक्रम है। मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव का रहने वाला हूँ। उम्र मेरी पच्चीस साल है और मैं खेती-बाड़ी करता हूँ। गाँव में लोक गीतों का बड़ा रिवाज है। खासकर शादी-ब्याह या त्योहारों पर रात भर लोक गीत गाए जाते हैं। लेकिन इस बार जो हुआ वो मेरी जिंदगी का सबसे गंदा और मजेदार वाकया था।
वो शाम की बात है जब हमारे गाँव में बरसात के बाद हवा ठंडी हो रही थी। मैं अपने खेत से लौट रहा था तो देखा कि गाँव की चौपाल पर लोग इकट्ठा हो रहे हैं। लोक गीत गाने का कार्यक्रम था। गाँव की औरतें और लड़कियाँ भी आ रही थीं। उनमें सबसे खास थी राधा। राधा की उम्र इक्कीस साल थी, गाँव की सबसे सुंदर लड़की। उसकी छाती पर भारी-भारी स्तन लटक रहे थे, कमर पतली और गोल-गोल नितंब इतने बड़े कि चलते वक्त हिलते रहते थे। वो अक्सर लोक गीत गाती थी, उसकी आवाज में जादू था।
मैं भी वहाँ पहुँच गया। लोग गाने लगे। “मेरे घर आजा रे, पिया बिना सूनी रे रात…” राधा गा रही थी। उसकी आँखें मेरी तरफ देख रही थीं। मैंने भी साथ गाया। गाने के बाद सब लोग थककर सो गए, लेकिन राधा और मैं पीछे रह गए। अंधेरा हो चुका था, बारिश शुरू हो गई थी।
राधा ने मुझे कहा, “विक्रम भाई, आज गाना बहुत अच्छा लगा। चलो, मेरे घर के पीछे वाले खेत में थोड़ी देर बैठते हैं।” मैं समझ गया कि आज कुछ होने वाला है। हम दोनों खेत में गए। बारिश में भीगते हुए उसके शरीर का नजारा देखकर मेरा लंड खड़ा हो गया। उसकी साड़ी भीगकर चिपक गई थी, स्तनों के निप्पल साफ दिख रहे थे।
राधा ने पहले मेरी तरफ देखा और मुस्कुराई। “विक्रम, तुम्हारा लंड खड़ा हो गया है क्या? लोक गीत सुनकर ही इतना गरम हो गए?” मैंने उसे खींच लिया। “राधा, तेरी गांड और चूत देखकर तो कंट्रोल नहीं हो रहा। आज तुझे चोदना है।” वो हँसी और बोली, “तो चोद ना, लेकिन धीरे से शुरू कर, गांव वाले सुन लेंगे।”
हम दोनों जमीन पर लेट गए। बारिश की बूंदें हमारे शरीर पर गिर रही थीं। मैंने उसकी साड़ी ऊपर उठाई। उसकी जांघें मोटी और चिकनी थीं। मैंने उसके पांवों को फैलाया और उसकी चूत पर हाथ फेरा। चूत पूरी गीली थी, बालों से भरी हुई। उंगलियां डाली तो गरम रस निकल रहा था। राधा सिसकने लगी, “आह… विक्रम, उंगली मत डाल, सीधा लंड डाल दे। चूत फट रही है।”
मैंने अपना लंड निकाला। लंड मोटा और सात इंच लंबा था, नसें उभरी हुई। मैंने उसकी चूत पर लगाया और धीरे से धक्का मारा। “आह्ह्ह… विक्रम, पूरा लंड घुसा दे!” राधा चीख पड़ी। लंड आधा अंदर गया तो मैंने जोर लगाया। पूरी चूत में लंड घुस गया। चूत का रस लंड पर बह रहा था। मैं धीरे-धीरे चोदने लगा। “राधा, तेरी चूत कितनी टाइट है, मेरा लंड अटक रहा है।”
हम दोनों जोर-जोर से चोद रहे थे। लोक गीत की ताल पर जैसे हमारा चोदना चल रहा हो। “थाप-थाप” की आवाज बारिश में भी सुनाई दे रही थी। राधा की गांड हिल रही थी। मैंने उसकी गांड पर थप्पड़ मारा, “ले, रंडी, और जोर से चूत मार।” वो बोली, “हाँ विक्रम, मुझे अपनी रंडी बना ले, चोदते रह।”
पहला दौर खत्म होने के बाद मैंने उसे कुत्ते वाली पोज में कर दिया। गांड ऊपर करके। लंड फिर से उसकी चूत में डाला। इस बार और गहरा। “आह्ह्ह…

विक्रम, गांड भी चोद दे!” मैंने उसकी गांड की गोलाई पकड़ी और जोर-जोर से धक्के मारे। लंड का सिरा गर्भाशय तक टकरा रहा था। राधा चीख रही थी, “मेरा रस निकल रहा है, विक्रम!”
हम घंटों चोदते रहे। लोक गीत गाते हुए, गंदी बातें करते हुए। “तेरी मम्मे चूसूँ?” मैंने पूछा। “हाँ, चूस ले, दूध पी ले मेरे लंड वाले।” मैंने उसके स्तन मुंह में लिया, निप्पल चूसा। दूध नहीं था लेकिन स्वाद बहुत मीठा था।
दूसरे दौर में मैंने उसकी गांड में लंड डालने की कोशिश की। “राधा, गांड मारूँ?” “मार, लेकिन धीरे।” गांड तंग थी। लंड आधा ही घुसा तो राधा चीखी, “आह्ह… जलन हो रही है!” लेकिन मैंने जारी रखा। गांड का छेद फैल गया और लंड अंदर घुस गया। अब दोनों छेदों में बारी-बारी से चोद रहा था। रस, पसीना, बारिश का पानी सब मिलकर शरीर चिपचिपा हो गया था।
राधा का शरीर काँप रहा था। “विक्रम, मुझे और चोद, आज रात भर चोदना।” हमने तीन बार झड़ चुके थे लेकिन लंड अभी भी खड़ा था। आखिरी बार मैंने उसकी चूत में ही झड़ गया। गरम-गरम वीर्य चूत में भर दिया। राधा बोली, “अब मेरी चूत पूरी भरी हुई है।”
सुबह होने तक हम चोदते रहे। लोक गीत की आवाज दूर से आ रही थी, लेकिन हमारी चुदाई की आवाज ज्यादा तेज थी। राधा ने कहा, “विक्रम, अब रोज शाम को लोक गीत सुनाएंगे और चोदेंगे।”
ये मेरी पहली चुदाई थी गाँव के लोक गीत वाले कार्यक्रम में। अब हर बार जब लोक गीत सुनता हूँ तो राधा की चूत और गांड याद आती है। दोस्तों, अगर आप भी गाँव में लोक गीत सुनो तो सावधानी से सुनना, वरना राधा जैसी कोई मिल जाए तो रात भर चुदाई हो जाएगी।