नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम रोहन है। मैं दिल्ली में रहता हूँ लेकिन मेरे पापा का पुश्तैनी गाँव उत्तर प्रदेश के एक छोटे से इलाके में है। पिछले महीने मुझे वहाँ जाना पड़ा क्योंकि दादाजी की तबीयत खराब थी। गाँव पहुँचते ही मुझे एक अजीब सी हलचल महसूस हुई। शाम को जब महिलाएँ देहाती लोक गीत गाती थीं तो उनकी आवाज़ों में कुछ ऐसा जादू था कि मेरा लंड अपने आप खड़ा हो जाता। खासकर एक औरत, रानी, जो हमारे पड़ोस में रहती थी। उसकी उम्र करीब पैंतीस साल थी, देहाती औरतों जैसी मोटी कमर, भारी भरे स्तन जो ब्लाउज में बंद होने को तैयार नहीं थे, और गोल-गोल बड़ी-बड़ी गांड।
रानी अक्सर शाम को लोक गीत गाती, “सजनवा तोहरा बिना जीना मुश्किल…” उसके गाने में एक अजीब सी कामुकता थी। एक रात बारिश हो रही थी और बिजली गुल हो गई। मैं अकेला कमरे में लेटा था जब रानी दरवाजे पर दस्तक देकर अंदर आई। “रोहन बाबू, अंधेरा में डर लग रहा है, थोड़ी देर बैठ जाऊँ?” उसकी आवाज़ में पहले से ही गीलापन था। मैंने हाँ कर दी।
वह पास बैठ गई। उसकी साड़ी की पल्लू सरक गई और उसके भारी स्तन ब्लाउज से बाहर निकलने को बेताब थे। “रोहन, तुम शहर वाले हो, हमारी देहाती लोक गीत UP का मज़ा लेना चाहोगे?” उसने मुस्कुराते हुए कहा। मैंने पूछा, “कैसा मज़ा?” उसने सीधे मेरे लंड पर हाथ रख दिया। “ये वाला मज़ा… जहां गीत गाते-गाते चूत गीली हो जाती है और लंड अंदर घुसता है।”
मैं चौंक गया लेकिन मेरा लंड तुरंत खड़ा हो गया। रानी ने मेरी पैंट खोल दी और मेरा मोटा लंड बाहर निकाल लिया। “अरे वाह, शहर का लंड तो देहाती चूत के लिए बिल्कुल सही है।” उसने उसे मुंह में लिया और चूसने लगी। उसकी जीभ मेरे लंड के सिरे पर घूम रही थी, लार टपक रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर उसका मुंह और गहराई तक धकेला। “चूस रानी, तेरी देहाती लोक गीत UP का असली स्वाद तो ये है।”
उसने लंड को चूसा और फिर उठकर अपनी साड़ी ऊपर उठा ली। उसकी चूत पूरी तरह गीली थी, बालों से भरी, मोटी लेबिया बाहर निकली हुई। “देख, लोक गीत सुनते-सुनते कितनी गीली हो गई हूँ।” मैंने उसके स्तनों को ब्लाउज से बाहर निकाला। वे भारी, निप्पल काले और खड़े थे। मैंने एक निप्पल मुंह में लिया और चूसते हुए उंगलियां उसकी चूत में डाल दीं। “आह… रोहन, उंगलियां अंदर घुसा, मेरी चूत फाड़ दे।”
मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसके पैर फैला दिए। उसकी चूत का रस बह रहा था। मैंने अपना लंड उसके प्रवेश द्वार पर रखा और एक झटके में आधा अंदर घुसा दिया। “ओह माँ… इतना मोटा लंड! धीरे… मेरी चूत फट जाएगी।” लेकिन मैंने जोर लगाया और पूरा लंड अंदर घुसा दिया। रानी चीख पड़ी, “चोदो मुझे, देहाती चूत को शहर के लंड से चोदो!”
हम धीरे-धीरे शुरू हुए। मेरा लंड उसकी चूत में अंदर-बाहर हो रहा था, चूत का रस लंड पर चिपक रहा था। मैं उसके स्तनों को दबा रहा था, निप्पलों को चूस रहा था। “रानी, तेरी गांड भी देखूं?” मैंने उसे उल्टा कर दिया। उसकी बड़ी-बड़ी गांड मेरे सामने थी। मैंने गांड के छेद पर उंगली घुमाई और फिर लंड को चूत में फिर से घुसा दिया। इस बार जोर-जोर से चोद रहा था। “थप-थप” की आवाज़ पूरे कमरे में गूंज रही थी। रानी चीख रही थी, “हाँ, और जोर से चोद, मेरी चूत का रस निकाल दे!”
मैंने उसकी गांड पर थप्पड़ मारे, लाल निशान पड़ गए। फिर मैंने लंड निकाला और उसके मुंह में डाल दिया। “चाट, अपना चूत का रस चाट।” रानी ने लंड चाटा और कहा, “अब मेरी गांड मारो।” मैंने थूक लगाकर गांड के छेद पर लंड रखा। धीरे-धीरे घुसाया। “आह…

दर्द हो रहा है लेकिन मज़ा भी आ रहा है।” पूरा लंड गांड में घुस गया। मैंने जोर-जोर से गांड मारी। रानी की गांड लाल हो गई, रस बह रहा था।
हम घंटों चोदते रहे। एक बार मैंने उसे ऊपर बैठाया। वह मेरे लंड पर उछल रही थी, उसके स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। “रोहन, मैं झड़ने वाली हूँ!” उसकी चूत ने मेरे लंड को कस लिया और गरम रस निकला। मैंने भी जोर लगाकर अंदर झड़ दिया।
लेकिन हम रुके नहीं। बारिश अभी भी हो रही थी। रानी ने फिर लोक गीत गाया, “सजनवा रात भर चोदो…” और हम फिर शुरू हो गए। इस बार मैंने उसकी चूत चाटी, जीभ अंदर डाली, क्लिटोरिस चूसा। रानी मेरा सिर दबा रही थी, “चाट मेरी चूत, लोक गीत UP का असली स्वाद ले।”
फिर उसने मेरे लंड को हाथों से मसलते हुए कहा, “अब मेरी गांड और चूत दोनों में लंड डाल।” हमने डबल पेनेट्रेशन की तरह खेला, उंगलियां और लंड मिलाकर। रानी बार-बार झड़ रही थी, चीख रही थी, “चोदो, फाड़ दो मेरी चूत-गांड!”
सुबह होने तक हम थक चुके थे। रानी ने कहा, “रोहन, अगली बार फिर आना, देहाती लोक गीत UP का मजा लेना।” मैं दिल्ली लौट आया लेकिन उस रात की यादें अभी भी मेरे लंड को खड़ा कर देती हैं।
(कहानी पूरी हुई, लेकिन याद रखना, ये सब कल्पना है। असल जिंदगी में हमेशा सहमति और सुरक्षा का ध्यान रखें।)