नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम राहुल है। मैं दिल्ली के करोल बाग इलाके में रहता हूँ। उम्र मेरी पैंतीस साल है और मैं एक छोटी सी इवेंट कंपनी चलाता हूँ। पिछले साल की बात है जब दीवाली के आसपास मेरी जिंदगी में एक ऐसा वाकया हुआ जिसने मुझे हमेशा के लिए बदल दिया। वो वाकया था दीवारी लोकगीत से जुड़ा। हमारे मोहल्ले में हर साल दीवाली पर महिलाएँ और लड़कियाँ मिलकर लोकगीत गाती हैं। रात के अंधेरे में दीये जलाकर, ठंडी हवा में उनकी मीठी आवाजें गूंजती हैं। उसी लोकगीत की महफिल में मेरी पड़ोस वाली भाभी अनीता ने मुझे अपनी तरफ खींच लिया।
अनीता उम्र में मुझसे दो साल बड़ी थी। पति विदेश में जॉब करता था। वो अक्सर अकेली रहती थी। गोल-गोल मोटी गांड, भारी-भारी स्तन और गोरी चमड़ी वाली औरत थी। जब वो लोकगीत गाती तो उसकी आवाज में एक अलग ही रस होता था। एक शाम मैं छत पर बैठा हुआ था। नीचे महिलाएँ दीवारी लोकगीत गा रही थीं। अनीता भी वहाँ थी। उसने लाल रंग की साड़ी पहनी हुई थी। उसकी पीठ पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। लोकगीत के बोल “दीवाली आई रे, दीपक जला रे” गाते हुए वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई।
मैं नीचे उतरा तो अनीता ने मुझे बुलाया। “राहुल, आओ ना, हमारे साथ गाओ।” उसकी आवाज में कुछ और ही था। हम सब मिलकर गा रहे थे। अंधेरा बढ़ रहा था। अनीता मेरे पास बैठ गई। उसकी साड़ी का पल्लू सरक गया। उसके स्तन का ऊपरी हिस्सा नजर आने लगा। लोकगीत गाते हुए उसने मेरे हाथ को अपनी जांघ पर रख दिया। “राहुल, ये लोकगीत सुनकर मन में कुछ और ही ख्याल आते हैं,” वो फुसफुसाई। मैं समझ गया कि आज रात कुछ होने वाला है।
हमने गाना बंद किया। अनीता ने मुझे अपने फ्लैट में बुला लिया। अंदर जाते ही उसने दरवाजा बंद किया और मेरे होंठों पर अपना मुंह लगा दिया। उसकी जुबान मेरे मुंह में घुस आई। “राहुल, आज मुझे अपनी दीवारी लोकगीत वाली भाभी बना ले,” वो सांस लेते हुए बोली। मैंने उसकी साड़ी उतार दी। उसके स्तन ब्रा से बाहर निकल आए। काले निप्पल खड़े हो गए थे। मैंने एक स्तन मुंह में लिया और चूसने लगा। अनीता चीख पड़ी, “आह्ह्ह… राहुल, मेरी चूचियां चूस, जोर से!”
उसने मेरी पैंट खोली। मेरा लंड बाहर निकल आया, सख्त और मोटा। अनीता ने उसे हाथ में लिया और सहलाने लगी। “कितना बड़ा लंड है तेरा, मेरी चूत फाड़ देगा।” वो घुटनों के बल बैठ गई और मेरे लंड को चूसने लगी। उसकी गर्म सांसें मेरे लंड पर पड़ रही थीं। “चूस रही हूं तेरा लंड, दीवारी लोकगीत की तरह रस निकाल दूंगी,” वो बोली। उसकी जीभ मेरे लंड के सिरे पर घूम रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर उसके मुंह में जोर से धक्का मारा। “ले भाभी, पूरा लंड गले तक ले!”
फिर मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। उसकी पैंटी उतारी। उसकी चूत पूरी तरह गीली थी। बालों से भरी, मोटी लेबिया वाली चूत। मैंने अपनी उंगलियां उसमें डालीं। “आह्ह्ह…

राहुल, उंगली मत डाल, सीधा लंड घुसा!” अनीता चीखी। मैंने उसके ऊपर चढ़कर अपना लंड उसकी चूत में घुसा दिया। “फट गई मेरी चूत!” वो चिल्लाई। मैं जोर-जोर से चोदने लगा। थाप-थाप की आवाजें पूरे कमरे में गूंज रही थीं। अनीता के स्तन उछल रहे थे। मैं उनको हाथों से दबा रहा था। “चोद मुझे, दीवारी लोकगीत गाते हुए चोद!” वो बोल रही थी।
हमने पोजीशन बदली। अनीता ने घोड़ी बनकर घुटनों के बल बैठ गई। मैंने पीछे से उसकी गांड में उंगली डाली और लंड चूत में घुसाया। “मेरी गांड भी चोद, राहुल!” उसने कहा। मैंने उसकी गांड थपथपाई और लंड को और जोर से अंदर मारा। उसकी चूत से रस निकलकर मेरे लंड पर बह रहा था। “रस बह रहा है, भाभी तेरी चूत का रस!” मैंने कहा। लोकगीत की याद में वो गुनगुना रही थी, “दीवाली आई रे…” लेकिन उसके बोल चीखों में बदल गए थे।
हम घंटों चोदते रहे। अनीता ने मुझे अपनी चूत चाटने को कहा। मैंने उसकी जांघें फैलाईं और जीभ से उसकी चूत चाटी। उसका स्वाद नमकीन और मीठा था। “चाट मेरी चूत, पूरा रस पी ले!” वो दबा रही थी। फिर उसने मेरे ऊपर बैठकर लंड अपनी चूत में लिया और ऊपर-नीचे होने लगी। उसके स्तन मेरे मुंह में थे। मैं चूस रहा था और वो चोद रही थी। “मेरा लंड तेरी चूत में फिट हो गया है,” मैंने कहा।
रात भर चला ये सिलसिला। सुबह होने को था जब हम दोनों थककर गिर पड़े। अनीता ने मुझे गले लगाया। “राहुल, अगली दीवाली फिर यही लोकगीत गाएंगे, लेकिन इस बार और गंदा खेलेंगे।” मैंने उसकी गांड सहलाई और कहा, “हां भाभी, दीवारी लोकगीत अब हमारी चुदाई की याद बन गई।”
(कहानी यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि अगली मुलाकातों में और भी लंबी और गंदी चुदाई हुई, लेकिन ये पहली रात की याद हमेशा ताजा रहेगी।)