नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम अर्जुन है। मैं दिल्ली के करोल बाग इलाके में एक छोटे से फ्लैट में रहता हूँ। उम्र मेरी 28 साल है और मैं एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता हूँ। रोज सुबह ऑफिस जाना, शाम को थककर लौटना, यही रूटीन था। लेकिन फिर एक दिन मेरे फ्लैट के बगल वाले कमरे में एक नई किरायेदार आ गई। उसका नाम था सुनीता, बिहार के छोटे से गाँव से दिल्ली आई थी नौकरी ढूंढने। उम्र करीब 24 साल, कद छोटा लेकिन शरीर ऐसा कि देखते ही लंड खड़ा हो जाए। गोरी नहीं, हल्की साँवली रंगत, मोटी-मोटी जांघें, बड़ी-बड़ी गांड और मोटे-मोटे स्तन जो ब्लाउज में बंद होकर भी फटने को तैयार लगते थे।
पहली बार जब मैंने उसे देखा तो वो सीढ़ियों पर सामान उठा रही थी। उसकी पीठ पसीने से भीग चुकी थी और साड़ी थोड़ी सरक गई थी, जिससे उसकी कमर की नरम चमड़ी दिख रही थी। मैंने मदद की तो वो मुस्कुराई और बोली, “भईया, थैंक्यू, बिहार से आई हूँ, सब कुछ नया लगता है।” उसकी आवाज में बिहारी लहजा था, जो और भी सेक्सी लग रहा था। धीरे-धीरे हमारी बातें बढ़ीं। वो अक्सर मेरे फ्लैट में पानी या चाय मांगने आ जाती। एक शाम बारिश हो रही थी। सुनीता अकेली थी, उसके रूम में बत्ती नहीं जल रही थी। वो दहशत में मेरे दरवाजे पर दस्तक देने आई।
“अर्जुन भाई, बत्ती चली गई है, डर लग रहा है।” मैंने उसे अंदर बुलाया। वो भीग चुकी थी, साड़ी शरीर से चिपक गई थी। उसके स्तनों के निप्पल साफ दिख रहे थे। मैंने तौलिया दिया और कहा, “पहले कपड़े बदल लो।” लेकिन वो शरमा गई। मैंने आगे बढ़कर उसकी साड़ी का पल्लू संभाला। उसकी साँस तेज हो गई। “अर्जुन, क्या कर रहे हो?” मैंने सीधा जवाब दिया, “तुम्हारी गांड और चूत देखकर लंड खड़ा हो गया है सुनीता।” वो हंस पड़ी लेकिन रोका नहीं।
मैंने उसे दीवार से लगाया और उसके होंठों पर अपना मुंह मार दिया। वो भी चूसने लगी। उसकी जीभ मेरी जीभ से लड़ रही थी। मैंने उसके ब्लाउज के हुक खोले। दो भारी स्तन बाहर निकले, काले-काले निप्पल खड़े हो चुके थे। मैंने एक को मुंह में लिया और चूसने लगा। सुनीता चीख पड़ी, “अह्ह्ह… अर्जुन, चूसो जोर से, मेरी चूचियाँ दूध से भर गई हैं।” मैंने दूसरा भी चूसा, काटा। उसके हाथ मेरे लंड पर पड़ गए। वो बोली, “कितना मोटा लंड है रे, बिहार में तो ऐसे नहीं होते।”
मैंने उसकी साड़ी और पेटीकोट उतार दिए। वो सिर्फ ब्लाउज और चड्डी में थी। चड्डी गीली हो चुकी थी। मैंने उंगली डाली तो उसकी चूत से रस टपक रहा था। “सुनीता, तेरी चूत कितनी गीली है।” “चोदो मुझे, अर्जुन, बिहारी औरत की चूत प्यासी है।” मैंने उसकी चड्डी फाड़ी और सीधा मुंह लगा दिया। उसकी चूत का स्वाद खट्टा-मीठा था। मैंने जीभ से चोदा, क्लिट को चाटा। सुनीता पैर फैलाकर चीख रही थी, “हाँ… और अंदर, चूत फाड़ दो।”
फिर मैंने अपना लंड निकाला। 7 इंच का मोटा लंड, नसें फूल गई थीं। सुनीता ने हाथ में लिया और बोली, “कितना गरम है, अब चोदो।” मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया, पैर उसके कंधों पर रखे और एक जोर का झटका मारा। लंड आधा अंदर चला गया। वो चीखी, “आह्ह्ह…

मर गई, इतना मोटा… धीरे।” लेकिन मैंने नहीं सुना। दूसरा झटका और पूरा लंड अंदर। उसकी चूत कसकर पकड़ रही थी।
हम घंटों चोदते रहे। पहले मिशनरी पोजीशन में, मैं उसके स्तनों को दबाता, चूत को जोर-जोर से ठोकता। “ले, ले मेरी बिहारी रंडी, तेरी चूत फाड़ दूंगा।” “हाँ, चोद, अर्जुन, गांड भी मार।” फिर मैंने उसे कुत्ते वाली पोजीशन में कर दिया। गांड ऊपर, चूत खुली। मैंने लंड पीछे से घुसाया। एक हाथ से उसकी गांड थपथपाता, दूसरा उसके बाल पकड़ता। “थप्पड़ मार, गांड लाल कर दे।” सुनीता चीख रही थी, “मार, और जोर से, रस निकाल दो।”
हमने कई बार पोजीशन बदली। वो मेरे ऊपर चढ़ी, लंड पर उछलने लगी। उसके स्तन उछल रहे थे, मैं उन्हें पकड़कर चूसता। फिर उसने पीछे मुड़कर मेरे अंडों को चाटा। “तेरा लंड स्वादिष्ट है।” मैंने उसका मुंह पकड़कर गला चोदा। वो खांसती लेकिन रुकती नहीं।
बारिश रुक गई लेकिन हमारी चुदाई नहीं। सुनीता ने कहा, “अब गांड में डाल।” मैंने थूक लगाया और धीरे से गांड में घुसाया। वो दर्द से चीखी लेकिन फिर मजे लेने लगी। “गांड फाड़, बिहारी औरत की गांड भी प्यासी है।” हम दोनों झड़ गए। मेरा गरम रस उसकी चूत और गांड में भर गया। वो चाटकर साफ करने लगी।
रात भर हम चोदते रहे। सुबह वो बोली, “अर्जुन, अब रोज चोदना, तेरी लंड के बिना नहीं रही जाएगी।” मैंने वादा किया। उसके बाद से वो अक्सर आती, हम चोदते। कभी किचन में, कभी बालकनी में, कभी शॉवर में। उसकी बिहारी चूत हमेशा गीली रहती।
(कहानी यहीं खत्म नहीं होती, लेकिन दोस्तों, इतनी लंबी चुदाई की डिटेल्स में और भी बहुत कुछ है। सुनीता की चूत का रस, उसकी सिसकारियां, मेरे लंड की थापें, सब यादगार है। दिल्ली की गर्मी में बिहारी औरत की ठंडी चूत ने मुझे पागल बना दिया।)